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ट्रांसफर नहीं, अब शिक्षकों को इंसाफ चाहिए – एक शिक्षक की पीड़ा | ShikshaBeat

ट्रांसफर नहीं, अब शिक्षकों को इंसाफ चाहिए – एक शिक्षक की पीड़ा | ShikshaBeat


कई साल बीते उस गाँव के स्कूल में,
जहाँ सड़क भी आए बस सपनों में।
कभी छत टपकी, कभी दीवारें टूटीं,
फिर भी हमने जिम्मेदारियाँ ना लूटीं।

बच्चों को अक्षर सिखाए धूप-छांव में,
कभी पंखा नहीं, कभी बैठे गाँव में।
आशा थी—कभी तो होगा ट्रांसफर,
थोड़ी राहत मिलेगी, थोड़ी साँस भर।

फिर आया ‘पोर्टल ट्रांसफर’ का सपना,
कहा गया – "अब होगा सिस्टम से अपना!"
पर जो होना था, वो तो उल्टा हुआ,
नजदीक वाला और करीब पहुंचा,
दूर वाला और भी दूर भटक गया।

किसी को घर से सौ किलोमीटर मिला,
किसी को जंगल के बीच तिनका टिका।
किसी को भेज दिया प्राइवेट स्कूल,
सरकारी शिक्षक बना मज़ाक का ‘टूल’।

शोर हुआ, हंगामा हुआ, धरना दिया,
तो सरकार बोली – “अब आपसी सहमति से कीजिए जिया।”
अब Mutual Transfer की बात चली,
जैसे ये कोई हल है, सबकी मुश्किलों की गली?

अब ढूंढो साथी वही विषय वाला,
जो तुम्हारी जगह आना भी चाहे, सच्चा मतवाला।
ना सिस्टम मदद करे, ना डेटा दे साफ,
बस भरो फॉर्म, भाग्य से माँगो माफ़।

कोई एक ‘ना’ कर दे, तो सबका खेल खत्म,
OTP, दस्तावेज़ – बन जाए त्रासद अंत।
ना संवेदनशीलता, ना महिला को राहत,
ना वरिष्ठों को मान, ना विकलांग को सहायत।

क्या यही है इनाम वर्षों की सेवा का?
क्या ऐसे होगा सपना “सशक्त शिक्षा” का?

अब तो बस मन यही कहता है—
“ट्रांसफर नहीं, इंसाफ दो सरकार,
सुनो उस शिक्षक की पुकार बारम्बार।”

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