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जमुई: झोपड़ी में चल रहा आंगनबाड़ी, यहीं पढ़ाई और यहीं रसोई; कब सुधरेगी बिहार की ये ज़मीनी हकीकत?

बिहार के जमुई (सोनो) में झोपड़ी में चल रहा आंगनबाड़ी केंद्र संख्या 225। 40 बच्चों का भविष्य खतरे में, जहाँ एक ही जगह होती है पढ़ाई और रसोई। जानिए पूरी

ज़मीनी हकीकत: झोपड़ी में भविष्य

बिहार के जमुई जिले के सोनो प्रखंड से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जो हमारे पूरे शिक्षा और पोषण सिस्टम पर गंभीर सवाल खड़े करती है। जहाँ एक तरफ डिजिटल इंडिया और आधुनिक शिक्षा की बातें होती हैं, वहीं दूसरी तरफ वार्ड नंबर 16 का आंगनबाड़ी केंद्र संख्या-225 पिछले दो वर्षों से एक जर्जर झोपड़ी में चल रहा है।

आंगनबाड़ी केंद्र में खाना खाते बच्चे 

विडंबना देखिए कि जिस केंद्र पर गाँव के 40 मासूम बच्चों का नामांकन है, वहाँ न तो कोई पक्का भवन है और न ही बच्चों के लिए एक सुरक्षित माहौल। सेविका अगाथा टुडू बताती हैं कि पहले इस केंद्र का संचालन एक छतदार चबूतरे पर होता था, लेकिन जब लोगों ने उस चबूतरे को मवेशी बांधने के लिए निजी उपयोग में लेना शुरू कर दिया, तो बच्चों का स्थान छीन गया। आखिरकार, ग्रामीणों के सहयोग से बनाई गई इस छोटी सी झोपड़ी को ही स्कूल, पोषण केंद्र और भोजनशाला बनाना पड़ा।

"किराए के भवन की व्यवस्था के लिए प्रक्रिया चल रही है। जल्द ही इकरारनामा पूरा होने के बाद आंगनबाड़ी केंद्र को नए भवन में स्थानांतरित कर दिया जाएगा।"

— बीनु कुमारी (सीडीपीओ, सोनो)

मौसम की मार और हादसों का डर

बारिश के दिनों में इस झोपड़ी पर प्लास्टिक की चादरें तानी जाती हैं। ठंड के मौसम में बच्चे ठिठुरने को मजबूर होते हैं, तो वहीं तपती गर्मियों में फूस की जलती छत के नीचे मासूम अपना समय बिताते हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इसी संकरी झोपड़ी में बच्चों के लिए भोजन भी पकाया जाता है। जलता हुआ चूल्हा, गैस सिलेंडर और बिल्कुल पास में बैठे छोटे-छोटे बच्चे—यहाँ हर सेकंड किसी बड़े हादसे की आशंका बनी रहती है।

💡 शिक्षित बिहार का नज़रिया और सुझाव

प्रशासनिक प्रक्रियाएं अपनी जगह हैं, लेकिन बच्चों के भविष्य और सुरक्षा को महीनों तक 'इकरारनामे' के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। 'शिक्षित बिहार अभियान' के तहत हमारे मुख्य सुझाव निम्नलिखित हैं:

  • त्वरित स्थानांतरण: जब तक पक्का भवन नहीं बनता, बच्चों को तुरंत किसी नजदीकी सरकारी स्कूल या सुरक्षित पक्के कमरे में शिफ्ट किया जाए।
  • सुरक्षित रसोई: झोपड़ी के अंदर खुले चूल्हे पर खाना बनाना तुरंत बंद हो, सुरक्षा सर्वोपरि है।
  • सामुदायिक सहभागिता: गाँव के प्रबुद्ध नागरिकों को आगे आकर प्रशासन पर दबाव बनाना होगा ताकि बच्चों का हक उन्हें मिल सके।

क्या आपके गाँव में भी ऐसा कोई स्कूल या आंगनबाड़ी केंद्र है?

अपनी आवाज़ उठाएं, हमें नीचे कमेंट करके बताएं या 'Submit Your Story' सेक्शन में जाकर रिपोर्ट भेजें।

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