शिक्षित बिहार
शिक्षा जगत के महत्वपूर्ण विचार
पिछले हफ्ते एक स्कूल में गया था, जहां एक शिक्षक करीब 20 छात्रों से 'भिन्न' का सवाल हल करा रहे थे। बच्चों ने कागज को आधे और चौथाई हिस्सों में मोड़ रखा था। वहां हलचल, रंग और चहल-पहल थी। कक्षा समाप्त होने पर जब कुछ बच्चों से पूछा कि भिन्न क्या होता है, तो वे अवाक रह गए। उन्होंने अपने हाथों में मुड़े हुए कागज को देखा और फिर मुझे देखा। उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं था। शिक्षक ने कक्षा में अभ्यास तो करा दिया, लेकिन कोई बच्चा सीख नहीं पाया था। इसमें शिक्षक की कोई गलती नहीं थी। वे पूरी ईमानदारी से वही करा रहे थे, जिसे अच्छी पढ़ाई मानी जाती है। गलती एक ऐसी बौद्धिक चूक में थी, जिसने दो दशकों से स्कूली शिक्षा का बेड़ा गर्क कर रखा है। हम अभी भी इसके नतीजे भुगत रहे हैं।
यह गलती 'रचनावाद' (कंस्ट्रक्टिविज्म) से जुड़ी है। इंसान को सीखने के लिए आंशिक रूप से 'रचनावाद' महत्वपूर्ण है। यह कहता है कि किसी निष्क्रिय दिमाग में ज्ञान डाला नहीं जा सकता। इसके लिए सीखने वाला स्वयं सक्रिय रूप से समझ बनाता है और नई चीजों को उन चीजों से जोड़ता है, जिन्हें वह पहले से जानता है। साल 2005 के 'नेशनल करिकुलम फ्रेमवर्क', यानी राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा में इस सिद्धांत को शिक्षा की सोच के केंद्र में रखा गया और रटंत विद्या, पाठ्यपुस्तकों के दबदबे और बच्चे को खाली बर्तन समझने जैसी मूल समस्याओं को हल करने के लिए कुछ नहीं किया गया।
सबसे अहम सबक यह है कि फॉर्मूला आधारित शिक्षा विवेक का शत्रु है। इसलिए, यहां मूल बात यह देखना है कि बच्चा सीख रहा है या नहीं।
सीखना निर्माण की एक सक्रिय व सतत प्रक्रिया है, लेकिन इस विचार को हमने छोड़ दिया और इसकी जगह 'पढ़ाने में निर्देश कम से कम होने चाहिए' को अपना लिया। इसमें 'शिक्षक को समझाने की जहमत नहीं उठानी है, निर्देश देना तानाशाही है, बच्चों को गतिविधि के जरिये खुद विचार खोजने चाहिए, अभ्यास व याद करना समझ के दुश्मन हैं' जैसी बातें होने लगीं। रचनावाद सोचने-समझने का एक फॉर्मूला न रहकर, पालन करने वाला एक सिद्धांत बन गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम में इन्हें नारों की तरह सिखाया गया, जैसे 'गतिविधियां अच्छी हैं, लेकिन समझाना बुरा है; खोज अच्छी है, बताना अच्छा है; समझना अच्छा है, याद रखना बुरा है।' पाठ्य-पुस्तक में अध्यायों की शुरुआत ऐसी गतिविधियों से की जाती है, जिन कराने के लिए शिक्षक के पास न तो समय होता है और न तैयारी। कक्षा की निगरानी करते वक्त यह देखा जाता है कि कितनी गतिविधियां हुईं, न कि यह कि किसने क्या सीखा?
इंसानी मामलों में यह एक पुराना पैटर्न है, जो सिर्फ शिक्षा तक सीमित नहीं है। अल्फ्रेड नॉर्थ व्हाइटहेड ने इसे 'फैलेसी ऑफ मिसप्लेस्ड कंक्रीटनेस' कहा था, यानी किसी अमूर्त विचार को ही वास्तविकता मान लेना। प्रत्येक अमूर्त अवधारणा कुछ चीजों को छोड़कर किसी न किसी मुख्य बात को उजागर करती है। रचनावाद कक्षा, बच्चों की संपूर्णता, विषय, शिक्षक, संसाधन आदि को छोड़ देता है। जब इस अमूर्त विचार को ही सर्वोपरि मान लिया जाता है, तो बाकी चीजों के साथ ऐसा व्यवहार किया जाता है, जैसे वे हैं ही नहीं। इस गलती में ही क्रूरता निहित है। इसके असर हर पर समान रूप से नहीं होते हैं। इसमें शिक्षित माता-पिता के बच्चे घर में मिलने वाली शिक्षा के कारण शिक्षा संबंधी कमियों से बच जाते हैं, लेकिन ऐसे परिवारों के छात्रों को कोई सहारा नहीं मिलता, जिनके परिवार की पहली पीढ़ी शिक्षा के क्षेत्र में जा रही होती है।
बच्चे की गरिमा और ज्ञान को जीवन से जोड़ना आज भी महत्वपूर्ण विचार है। अच्छा शिक्षण कर्म किसी फॉर्मूले का पिछलग्गू नहीं हो सकता। यह पूरी तरह से विवेक का मामला है। शिक्षक के लिए यह जानना जरूरी है कि कब समझाना है और कब बच्चों को संघर्ष करने देना है, कब कोई गतिविधि समझ को गहरा करती है या केवल समय बिताने का साधन भर है और किन चीजों को अभ्यास के माध्यम से आत्मसात कराना है, ताकि मन सोचने के लिए स्वतंत्र रहे। कुल मिलाकर, सबसे अहम सबक यह है कि फॉर्मूला आधारित शिक्षा विवेक का शत्रु है। इसलिए, मूल बात यह देखना है कि बच्चा सीखता है या नहीं?
(ये लेखक के अपने विचार हैं)
